Ved (ਸ਼੍ਰੂਤਿ, श्रुति, Shruti) & Vedanta (ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ, स्मृति, Smriti)

Ved (ਸ਼੍ਰੂਤਿ, श्रुति) & Vedanta (ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ, स्मृति)

Shruti or Ved is considered as the Wisdom “that which has been heard within the heart as a Shabad not through the external ears” and is canonical, consisting of revelation and unquestionable truth, and is considered eternal. 

The word Vedanta (Ved + Anta, ਵੇਦ ਦਾ ਅੰਤ, वेद का अंत) literally means the thought process which ends the era of Veds (the revealed knowledge)  and originally referred to the Upani-shadsVedanta was concerned with the jñānakāṇḍa or translation of Vedic knowledge, called the Upanishads or Smritis.

Smriti is that knowledge “which has been remembered” supplementary and may change over time. It is authoritative only to the extent that it conforms to the bedrock of Shruti

The Upanishads era has been regarded as the end of Vedic era: These were the literal translations of the Veds (Sam Ved, Rig Ved, Yajur Ved, Atharva Ved). There were mis-interpretations in the translations of Upnishads due to lack of understanding of the true message of Veds which were all in Sentient terms.

One of the major mis-interpretation was in the mis-understanding the Vedic word Guru (ਗੁਰੂ, गुरू).

As per the Veds The Guru (ਗੁਰੂ गुरू) is unborn (ਅਜੂਨੀ, अजूनी beyond birth ) and is referred as a collective noun such as:  People, board, choir, class, committee, family, group, jury, panel, staff army.

Bhagat Kabir Ji has specifically  indicated this misinterpretation in Gurbani writings.

ਕਬੀਰ ਬਾਮਨੁ ਗੁਰੂ ਹੈ ਜਗਤ ਕਾ ਭਗਤਨ ਕਾ ਗੁਰੁ ਨਾਹਿ ॥ 

ਅਰਝਿ ਉਰਝਿ ਕੈ ਪਚਿ ਮੂਆ ਚਾਰਉ ਬੇਦਹੁ ਮਾਹਿ ॥੨੩੭॥   

(Page 1377, Shalok Bhagat Kabir Ji)

कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि॥

अरझि उरझि के पचि मुआ चारउ बेदहु माहि ॥२३७॥

Proclaims Kabir,

The Brahman has established himself as Guru within this world through the non -Vedic or Vedanta texts, but, the Bhagats who has the Vedic or revealed Knowledge hasn’t recognised him even as a Gur (ਗੁਰੁ, गुरु) or born Saint. He has entangled himself in the perplexity of Vedic Spiritual Wisdom.

The Upnishads gave a new name of Parmatma (ਪਰਮਾਤਮਾ, परमात्मा) to the Creator. And the word Guru (ਗੁਰੂ, गुरू) used in the Veds for Creator, started to be used for humans who actually are  created beings. Those established literary Spiritual Schools were known as GURUKULS (गुरुकुल), they use to  impart Vedantic knowledge to the disciples.

The Vedanta seems to consists of three sets of books, the Brahmasutras by Baadaraayan, Gita, as part of Mahabharata, and supposed to be told by Krishna, and the principle 11 Upanishads. This as a whole constitutes the philosophy of the Vedanta.

The fact about the difference in thought process between Veds (Shruti) and Smriti is found in Gurbani at numerous places. The one recorded in Anand Bani in the “Raam-Kali” Raag is mentioned below:

ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਪੁੰਨ ਪਾਪ ਬੀਚਾਰਦੇ ਤਤੈ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੀ ॥ 

ਤਤੈ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੀ, ਗੁਰੂ ਬਾਝਹੁ, ਤਤੈ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੀ ॥     

(Panna 920, ਰਾਮਕਲੀ, ਮ; ੩)

सिमृति सासत्र पुन्न पाप बीचारदे ततै सार न जानी ॥

ततै सार न जाणी  गुरू बाझहु ततै सार न जानी ॥

(Panna 920 रामकली म: ३)

Proclaims Nanak:

Without the real essence of the prevailing Hukam (Universal Will) of Guru (ਗੁਰੂ , गुरू) OR Paarbraham (ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ, पारब्रह्म). The Simritis and shashtras are trying to distinguish between Good and Evil based on wordily knowledge,  Without the Vedic Revelations,  they wont be able to judge between Good and evil.  Whatever happens in this world is due to the Omnipresence Hukam. Beings are incapable of any free will of doing Good or Evil within the presence of Omnipotent: Guru (ਗੁਰੂ , गुरू) OR Paarbraham (ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ, पारब्रह्म).

A brief description of the above Vedic facts about Shruti and Simrati is given below in Hindi text.

श्रुति और स्मृति

श्रुति वेद धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थों का समूह है। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है सुना हुआ, यानि पारब्रह्म (परम-ईश्वर) की वाणी जो प्राचीन काल में भगतों द्वारा सुनी गई थी और शिष्यों के द्वारा सुनकर जगत में फैलाई गई थी।

इस दिव्य स्रोत के कारण इन्हें वेद धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत माना है। इनके अलावा अन्य ग्रंथों को स्मृति माना गया है – जिनका अर्थ है मनुष्यों के स्मरण और बुद्धि से बने ग्रंथ  जो वस्तुतः श्रुति के ही मानवीय विवरण और व्याख्या माने जाते हैं। श्रुति और स्मृति में कोई भी विवाद होने पर श्रुति को ही मान्यता मिलती है, स्मृति को नहीं। श्रुति में चार वेद आते हैं : ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। इनके अलावा बाकी सभी धर्मग्रन्थ स्मृति के अन्तर्गत आते हैं।

स्मृतियों, धर्मसूत्रों, मीमांसा, ग्रंथों, निबन्धों महापुराणों में जो कुछ भी कहा गया है वह श्रुति की महती मान्यता को स्वीकार करके ही कहा गया है। ऐसी धारणा सभी प्राचीन धर्मग्रन्थों में मिलती है। अपने प्रमाण के लिए ये ग्रन्थ श्रुति को ही आदर्श बताते हैं। इसकी छाप प्राचीनकाल में इतनी गहरी थी कि वेद शब्द श्रद्धा और आस्था का द्योतक बन गया।

इसीलिए पीछे की कुछ शास्त्रों को महत्ता प्रदान करने के लिए उनके रचयिताओं ने उनके नाम के पीछे वेद शब्द जोड़ दिया। सम्भवतः यही कारण है कि धनुष चलाने के शास्त्र को धनुर्वेद तथा चिकित्सा विषयक शास्त्र को आयुर्वेद की संज्ञा दी गई है। महाभारत को भी पंचम वेद इसीलिए कहा गया है कि उसकी महत्ता को अत्यधिक बल दिया जा सके।

उदाहरणार्थ मनु की संहिता को मनुस्मृति माना जाता है। इसके अनुसार समाज, परिवार, व्यापार दण्डादि के जो प्रावधान हैं वह मनु द्वारा विचारित और स्मृति पर आधारित हैं। लेकिन ये पारब्रह्म द्वारा कहे गए शब्द (या नियम) नहीं हैं। अतः ये एक स्मृति ग्रंथ है।

वेदों को श्रुति दो वजह से कहा जाता है :

1.    इनको पारब्रह्म ने प्राचीन भगतो  जैसे ध्रू,  प्रलाहद को उनके अन्तर्मन में सुनाया था जब वे ध्यानमग्न थे। अर्थात श्रुति पूरनब्रह्म रचित हैं।

2.    वेदों को पहले लिखा नहीं जाता था, इनको भगतों ने अपने शिष्यों को सुनाकर याद करवा देते थे और इसी तरह परम्परा चलती थी।

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